Monday, March 15, 2010

भूमिका

मुझे अपनी बात को सजा कर कहना नहीं आता ........कहने के लिए तो दिल में ढेर सी बातें होती हैं ..लेकिन उसको व्यक्त करते वक़्त मुझे शब्दों की कमी महसूस होने लगती है ........यही कारण है कि ब्लॉग बनाने की सोचते-सोचते इतने समय निकल गया .........मैं भूमिका के लिए शब्दों को ढूँढती रही ........और स्वर्णिम वक़्त निकलता गया ..........अब मैंने सोचा है कि अब बस ......देर न हो जाये ..........दिल से निकली बातें ....दिल से समझी जाती हैं ....... ....चाहे उसके शब्द सुन्दर हों या ...या ना हों .....तो चलिए मैं अपने ह्रदय कि बातों को कहने कि शुरुआत करती हूँ ...।

1 comment:

KP Tripathi said...

kabhe-kabhedil se nikle bat juba se niklakar jab lekawat ka roop lete ha.tu uske kubsurtee baya karna muskil hi nahe balkee uske liye koe sabad nahe hote

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main kaun hun?main kya hun?apne aap ko janne ki talash av bhi jari hai......ishwar ki banai ek kriti hun or apne shrijan ke bare me khud shrata hi bata sakta hai ......